
मुंबई / अकबर खान
मुंबई : केंद्र सरकार द्वारा संसद में बिजली (संशोधन) विधेयक 2021 रखे जाने की तैयारी के बीच बिजली कर्मचारी इसके विरोध में तीस जनवरी को दिल्ली के जंतर मंतर पर सत्याग्रह धरना शुरू करेंगे। इलेक्ट्रिसिटी इम्प्लाइज एंड इंजीनियर्स’ (एनसीसीओईई) के आवाहन पर देशभर के बिजली कर्मचारी और इंजीनियर 30 जनवरी से जंतर मंतर पर सत्याग्रह कर बिजली (संशोधन) विधेयक के विरोध में केंद्र सरकार का ध्यानाकर्षण की चेतावनी दी। भारतीय विद्युत कर्मचारी एवं अभियंता संघ के नेता शैलेंद्र दुबे, कॉमरेड मोहन शर्मा, कॉमरेड सुदीप दत्ता, कॉमरेड कृष्णा भोयर, रत्नाकर राव, संजय ठाकुर, लक्ष्मण राठौड़ ने मुंबई मराठी पत्रकार संघ मे प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जानकारी दी l मोहन शर्मा मीडिया से बातचीत करते हुए, *एन सी सी ओ ई ई ई से* विद्युत (संशोधन) विधेयक 2025 को वापस लेने की मांग की। बिजली के निजीकरण और विद्युत (संशोधन) विधेयक 2025 के खिलाफ बिजली कर्मचारी 30 जनवरी को दिल्ली में विरोध प्रदर्शन करेंगे। बता दे की 27 लाख बिजली कर्मचारी और अभियंता इस जनविरोधी विधेयक के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन करेंगे। वही अगर सरकार मांगों पर ध्यान नहीं देती है, तो हम नियम पारित करेंगे और सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरेंगे। सभी ट्रेड यूनियन इसमें शामिल होंगे। बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरों की राष्ट्रीय समन्वय समिति (एन सी सी ओ ई ई ई) ने बिजली क्षेत्र के निजीकरण और बिजली (संशोधन) के खिलाफ दिल्ली में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन का इशारा दिया l *एन सी सी ओ ई ई ई* ने मांग की है कि केंद्र सरकार किसान विरोधी, उपभोक्ता विरोधी और कर्मचारी विरोधी बिजली (संशोधन) विधेयक, 2025 को तुरंत वापस ले। बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरों की राष्ट्रीय समन्वय समिति (एनसीसीओईईई) की 3 नवंबर, 2025 को मुंबई में बैठक हुई। विस्तृत चर्चा के बाद, यह निर्णय लिया गया कि यदि भारत सरकार उनकी आवाज नहीं सुनती है, तो देश भर के 27 लाख बिजली कर्मचारी और इंजीनियर बिजली (संशोधन) विधेयक 2025 और बिजली क्षेत्र के निजीकरण के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन शुरू करने के लिए मजबूर होंगे। बैठक में बिजली (संशोधन) विधेयक 2025 के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन की रणनीति भी बनाई गई। किसानों और मज़दूरों के साथ मिलकर एक संयुक्त आंदोलन शुरू करने के लिए, 14 दिसंबर 2025 को दिल्ली में संयुक्त किसान मोर्चा और अखिल भारतीय ट्रेड यूनियनों के नेताओं के साथ एनसीसीओईईई कोर कमेटी की एक संयुक्त बैठक आयोजित करने का निर्णय लिया गया। निजीकरण और बिजली (संशोधन) विधेयक 2025 के ख़िलाफ़ कर्मचारियों और इंजीनियरों को लामबंद करने और 30 जनवरी को “दिल्ली चलो” का आह्वान करने के लिए नवंबर, दिसंबर और जनवरी में सभी राज्यों में एनसीसीओईईई के राज्य स्तरीय संयुक्त सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय लिया गया। आज जारी एक बयान में, एनसीसीओईईई नेताओं ने कहा कि बिजली (संशोधन) विधेयक 2025 के ज़रिए केंद्र सरकार देश के पूरे बिजली क्षेत्र का निजीकरण करना चाहती है। निजीकरण के बाद बिजली की दरें इतनी बढ़ जाएँगी कि वे किसानों और आम उपभोक्ताओं की पहुँच से बाहर हो जाएँगी। उन्होंने कहा कि संशोधन विधेयक की धारा 14, 42 और 43 के ज़रिए निजी कंपनियों को सरकारी बिजली नेटवर्क के इस्तेमाल का अधिकार दिया जा रहा है। वितरण कंपनियाँ बिजली की आपूर्ति करेंगी और बदले में सरकारी डिस्कॉम को केवल नाममात्र का व्हीलिंग शुल्क देंगी। उन्होंने कहा कि यह सार्वजनिक क्षेत्र में बिजली वितरण के अंत की शुरुआत होगी। उन्होंने बताया कि नेटवर्क को बनाए रखने और उसे मज़बूत करने की पूरी ज़िम्मेदारी सार्वजनिक वितरण कंपनियों की होगी। इसका वित्तीय बोझ सार्वजनिक वितरण कंपनियों पर पड़ेगा, जबकि निजी कंपनियों को इस नेटवर्क के ज़रिए पैसा कमाने की आज़ादी होगी। उन्होंने कहा कि इस संशोधन विधेयक के अनुसार, निजी कंपनियाँ सार्वभौमिक बिजली आपूर्ति की बाध्यता से बंधी नहीं होंगी। इसका दुष्परिणाम यह होगा कि निजी कंपनियाँ सार्वजनिक वितरण कंपनी के नेटवर्क का इस्तेमाल मुनाफ़ा कमाने वाले औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं को बिजली आपूर्ति करने के लिए करेंगी, जबकि किसानों और गरीब घरेलू उपभोक्ताओं को बिजली आपूर्ति करने की ज़िम्मेदारी सार्वजनिक वितरण कंपनियों की ही रहेगी। परिणामस्वरूप, सार्वजनिक वितरण कंपनियाँ दिवालिया हो जाएँगी और उनके पास बिजली खरीदने या अपने कर्मचारियों को वेतन देने के लिए पैसे नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि संशोधन विधेयक में अगले पाँच वर्षों में क्रॉस-सब्सिडी को समाप्त करने के लिए धारा 61(जी) में संशोधन का प्रस्ताव है। इसके साथ ही, विधेयक में प्रावधान है कि बिजली की दरें लागत-प्रतिबिंबित होनी चाहिए, यानी किसी भी उपभोक्ता को लागत से कम कीमत पर बिजली नहीं दी जानी चाहिए। इसका मतलब है कि अगर 6.5 हॉर्स पावर का पंप दिन में छह घंटे चलता है, तो किसानों को कम से कम 12,000 रुपये प्रति माह बिजली बिल के रूप में देना होगा। इसी तरह, गरीबी रेखा से नीचे के उपभोक्ताओं के लिए बिजली की दरें कम से कम 10-12 रुपये प्रति यूनिट होंगी। इसके अलावा, विधेयक में आभासी बिजली बाजारों और बाजार आधारित व्यापार प्रणालियों को बढ़ावा देने का प्रस्ताव है। इससे दीर्घकालिक अनुबंध अस्थिर हो जाएंगे और बिजली की लागत अधिक अस्थिर हो जाएगी। उन्होंने कहा कि संविधान की सातवीं अनुसूची में बिजली समवर्ती सूची में सूचीबद्ध है, जिसका अर्थ है कि बिजली के मामले में केंद्र और राज्य सरकारों के पास समान अधिकार हैं। इस संशोधन विधेयक के माध्यम से, केंद्र सरकार बिजली के मामले में राज्यों की शक्तियों को छीन रही है और बिजली की दरों के वितरण और निर्धारण में केंद्र सरकार का सीधा हस्तक्षेप होगा, जो संघीय ढांचे और संविधान की भावना के खिलाफ है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में अखिल भारतीय विद्युत कर्मचारी एवं अभियंता संघ के नेता शैलेन्द्र दुबे, कामरेड मोहन शर्मा, कामरेड सुदीप दत्ता, कामरेड कृष्णा भोयर, रत्नाकर राव, संजय ठाकुर, लक्ष्मण राठौड़ आदि उपस्थित थे।